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राष्ट्र को समर्पित पं.लोचनप्रसाद पांडेय की पद्म पुष्पांजलि

राष्ट्र को समर्पित पं . लोचनप्रसाद पाण्डेय की पद्म पुष्पांजलि *************************************** डाँ. बलदेव     अन्य समकालीन साहित्यकारों की अपेक्षा पाण्डेय जी की मुश्किलें कुछ ज्यादा दिखाई देती हैं । पहले दो भाषा को ही लें । वे पहले ब्रजभाषा में लिखते थे । तब छत्तीसगढ़ के दो साहित्यकार जगमोहन सिंह ठाकुर और आचार्य जगन्नाथ भानु पूरे हिन्दी प्रदेश में ख्यात हो चुके थे । इनमें प्रथम प्रेम और सौंदर्य के रसिकराज कवि थे , तो दूसरे पिंगलाचार्य । दोनों की भाषा ब्रज थी । पाण्डेय जी आचार्य भानु को गुरुवर मानते थे , उनके सानिध्य का लाभ भी उन्हें मिला , लेकिन ब्रज छोड़ कर उन्होंने हिन्दी में प्रवेश किया , यह एक जोखिम भरा काम था । जबकि ब्रज और हिन्दी का झगड़ा उग्र रूप धारण कर चुका था । इतना ही नहीं , आगे बढ़कर पाण्डेय जी ने उड़िया ही नहीं , छत्तीसगढ़ी में भी लिखने का साहस किया । इसके पीछे उनका उद्देश्य समझ में आता है निम्न पंक्तियों दृष्टव्य हैं:-            सुनत हव निंद के घोर        ...

बसन्त राघव की दो कविताएं

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बसन्त राघव की दो कविताएं ------------------------------------ प्रेम कथा ---------- उसकी नंगी पीठ पर मैं लिखता रहा सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा नाम वह बर्दाश्त करती रही मेरी बेवफाई जबकि वह प्रेम करती रही मुझसे और मैं पेड से नहीं आकाश नापती हुई चिडिया से प्रेम करता रहा ।      *** मैं मरा नहीं --------------- उसके गोली दागने के पहले मैंने उसकी आंखों में झांका वह बेहद डरा हुआ था उसने चुरा लिए थे मेरे सारे हथियार ,गोला ,बारूद लेकिन मेरे भीतर बहुत भीतर विराजमान थीं भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद की आत्माएं मैं मरा नहीं अमर हो गया ।         *** बसन्त राघव पंचवटी नगर, बोईरदादर रायगढ़, छत्तीसगढ़ मो.नं. 8319939396

विश्वबोध:कविता संग्रह:-मुकुटधर पांडेय

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छायावाद और पं.मुकुटधर पांडेय

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पं.मुकुटधर पांडेय के काव्य की पृष्ठभूमि: डाँ. बलदेव

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मुकुटधर पाण्डेय के काव्य की पृष्ठभूमि *****************************डाँ०बलदेव      पंडित मुकुटधर पाण्डेय संक्रमण काल के सबसे अधिक सामथ्यर्वान कवि हैं। वे व्दिवेदी-युग और छायावाद के बीच की ऐसी महत्वपूर्ण कड़ी हैं, जिनकी काव्य यात्रा को समझे बिना खड़ी बोली काव्य के दूसरे-तीसरे दशक तक के विकास को सही रूप से नहीं समझा जा सकता। उन्होंने व्दिवेदीयुग के शुष्क उद्यान में नूतन सुर भरा तथा नव बसन्त की अगवानी कर के युग-प्रवर्तन का ऐतिहासिक कार्य किया।       मुकुटधर पाण्डेय जी जीवन की समग्रता के कवि हैं। उनके काव्य में प्रसन्न और उदास दोनों पक्ष के  छायाचित्र हैं। प्रकृति के सौन्दर्य में अलौकिक सत्ता का आभास मिलता है, उसके प्रति कौतूहल उनमें हर कहीं विद्ममान है। यदि एक ओर उनके काव्य में अंतस्सौंदय की तीव्र एवं सूक्ष्मतम अनुभूति, समर्पण और एकान्त साधना की प्रगीतात्मक अभिव्यन्जना है, तो दूसरी ओर व्दिवेदीयुगीन प्रासादिकता और लोकहित का आर्दश। महाकवि निराला ने इन्हीं विशेषताओं के कारण उन्हें मार्जित कवि कहा है। उनके शब्दों में इस जमाने और सनेही जी के जमाने के ...

छायावाद के प्रर्वतक पं.मुकुटधर पांडेय : डाँ बलदेव

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छायावाद के प्रर्वतक पं. मुकुटधर पांडेयः  -            -----------------------------------------------    (विश्वबोध कविता संग्रह से, संपादक -डाँ०बलदेव)    प्रकाशकीय:- युग प्रवर्तक कवि पं. मुकुटधर पांडेय की श्रेष्ठ और विलुप्त प्राय रचनाओं को प्रथम बार पुस्तकाकार प्रकाशित करते हुए हमें आपार हर्ष का अनुभव हो रहा है। पांडेय जी के नाम पिछले पच्चीस-तीस वर्षों से जिज्ञासा भरे पत्र आते रहे हैं। जिनमें हिन्दी के समर्थ आलोचकों से लेकर सामान्य पाठकों तक ने उनकी रचनाओं को पढ़ने की बार बार इच्छा  प्रकट की है। हिन्दी के अनेक शोधकर्ताओं को भी उनकी प्रमाणित सामग्री के अभाव में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। इस अभाव को पूर्ण करने की दृष्टि से सीमित साधनों के बीच यह छोटा सा प्रयास है। ये कविताएं व्दिवेदी युग और छायावाद युग की कविताओं के प्रमाणिक दस्तावेज हैं। इनसे खड़ी बोली काव्य धारा के इतिहास को समझने में मदद मिलेगी।          आशा ही नहीं हमें पूर्ण विश्वास है हिन्दी संसार इस कविता-संग्रह का स्वागत क...